Chapter 18: Sameer Sees It
Sameer पिछले तीन हफ्तों से ठीक से सो नहीं पा रहा था।
हर रात वही सपना। एक corridor। संकरा, अंधेरा, दीवारों पर नमी। और उसके अंत में — एक दरवाज़ा। "0" लिखा था उस पर।
वो दरवाज़े के पास जाता। हाथ बढ़ाता। और तभी — कोई आवाज़। कोई उसका नाम बुलाता। और वो भागता। हमेशा भागता।
आज रात भी वही हुआ।
Sameer नींद में चीखा। उसकी आँखें खुलीं — पसीने से तरबतर, साँसें तेज़। वो on-call room में था — छोटा सा कमरा, एक बेड, एक table। दीवार पर घड़ी — रात 3:15।
"फिर वही सपना," उसने खुद से कहा।
लेकिन ये सपना नहीं था। Sameer जानता था।
पहली बार जब उसने ये सपना देखा, तो उसने सोचा — बस, stress है। Exams का pressure। लेकिन अब तीन हफ्ते हो गए। और हर रात वही।
वो उठा और washroom गया। चेहरा धोया। आईने में देखा — उसकी आँखें लाल थीं, चेहरा पीला।
"मैं पागल नहीं हूँ," उसने कहा।
लेकिन क्या?
वो वापस bed पर लेट गया। नींद नहीं आई। बस सपना आता रहा — बार-बार, हर रात। corridor, दरवाज़ा, "0"।
अगली शाम Sameer ने Dr. Kapoor से बात की।
"सर, मुझे एक बात बताइए... क्या Room 0 सच में exist करता है?"
Kapoor ने अपनी chai का cup नीचे रखा। उसका चेहरा बदला — थोड़ा। बहुत थोड़ा। लेकिन Sameer ने notice किया।
"तुम्हें क्यों लगता है कि exist करता है?"
"मैं... मैंने देखा है। सपने में। बार-बार। एक corridor। एक दरवाज़ा। '0' लिखा है।"
Kapoor ने गहरी साँस ली। "Sameer, तुम बहुत ज़्यादा काम कर रहे हो। तुम्हें आराम की ज़रूरत है।"
"लेकिन सर —"
"बेटा, मैंने भी बहुत देखा है इस hospital में। रात की duty में थकान होती है। दिमाग़ play करता है। बस इतना है।"
Sameer ने Kapoor को देखा। उसकी आँखों में शक था। लेकिन उसने कुछ कहा नहीं।
वो बाहर आया। corridor में चलने लगा। तभी उसकी नज़र corridor के आखिरी में पड़ी —
वहाँ एक और corridor था।
छोटा, संकरा, अंधेरा। जो hospital के floor plan में मौजूद नहीं था।
Sameer ने रुककर देखा। corridor खाली था। लेकिन उसके अंत में — एक दरवाज़ा।
"0"।
Sameer का दिल ज़ोर से धड़का। उसके पैर काँप रहे थे। उसका दिमाग़ कह रहा था — भाग। अभी भाग।
लेकिन उसका शरीर जैसे जम गया था। वो देख रहा था — corridor, दरवाज़ा, "0"। वही जो हर रात सपने में आता था।
अब सपना नहीं था। अब असली था।
Sameer ने पीछे मुड़कर भागा। तेज़-तेज़। corridor से, stairs से, emergency wing से। बाहर आया। हाँफते हुए। काँपते हुए।
"ये... ये कैसे हो सकता है?"
बीप ————–
अगली सुबह Sameer ने Dr. Kapoor को ढूंढा।
"सर, मैंने कल रात देखा। सपना नहीं — असली में। corridor था। दरवाज़ा था। '0' लिखा था।"
Kapoor का चेहरा बदल गया। इस बार — पूरी तरह।
"तुमने... तुमने देखा?"
"हाँ सर। और मैं भाग गया। लेकिन... ये क्या था?"
Kapoor ने गहरी साँस ली। "Sameer, सुनो। जो तुमने देखा, वो भूल जाओ। बिल्कुल भूल जाओ।"
"लेकिन सर —"
"सुनो। अभी। और एक बात — इस बारे में किसी से बात मत करो। किसी से भी। खासकर आरव से।"
Sameer ने सवालिया नज़रों से देखा। "आरव से? क्यों?"
"बस। मेरी बात मानो। आरव से मत बात करो।"
Sameer चुप रहा। लेकिन उसके दिमाग़ में सवाल घूम रहे थे —
Kapoor को कैसे पता कि Sameer ने corridor देखा? उन्होंने कभी नहीं कहा कि Room 0 exist करता है। लेकिन अब जब Sameer ने बताया, तो वो तुरंत मान गए।
और आरव से बात मत करो — ये specific क्यों?
शायद Kapoor को पहले से पता है।
शायद Kapoor Room 0 जानता है।
शायद Kapoor... Room 0 का हिस्सा है।
4:05 AM
उस रात Sameer सो नहीं पाया। वो अपने bed पर लेटा था और खिड़की से बाहर देख रहा था।
अस्पताल दूर खड़ा था। Emergency Wing की लाइटें जल रही थीं।
उसने सोचा — कल वो आरव से बात करेगा। Kapoor ने मना किया था, लेकिन Sameer को जवाब चाहिए थे।
और अगर Room 0 सच में exist करता है... तो उसे पता करना होगा।
चाहे कुछ भी हो जाए।
लेकिन उसके दिमाग़ में एक और बात थी — वो आवाज़। सपने में। corridor में। जो उसका नाम बुलाती थी।
वो आवाज़... किसकी थी?
Sameer ने सोचा — शायद वो उसकी माँ की आवाज़ थी। जो दस साल पहले मर गई थी।
शायद Room 0 उसकी माँ की आवाज़ में बोल रहा था।
शायद Room 0 हर किसी को उस आवाज़ में बुलाता है जो उसके सबसे करीब हो।
जो मर चुका हो।
जो वापस नहीं आ सकता।
4:30 AM
Sameer ने खिड़की बंद की और आँखें बंद कीं।
लेकिन नींद नहीं आई।
बस सपना आता रहा — corridor, दरवाज़ा, "0"।
और एक आवाज़ —
"Sameer... अंदर आओ..."
उसकी माँ की आवाज़।
Login to comment.