Chapter 5: Room 0
आरव का दिल रुक गया।
"आरव? तुम इतने छोटे कैसे हो गए?"
मरीज़ उसे देख रहा था। उसकी आँखों में confusion था — लेकिन एक तरह का जानने वाला confusion। जैसे कोई अपने बच्चे को देखे और समझ ना पाए कि इतना बड़ा कैसे हो गया।
"तुम... तुम मुझे जानते हो?" आरव ने पूछा।
मरीज़ ने हँसने की कोशिश की। खाँसी आ गई।
"जानता हूँ? बेटा, मैंने तुझे गोद में उठाया है। तेरी माँ के साथ बैठकर चाय पी है। तेरे पापा के साथ क्रिकेट खेला है।"
आरव पीछे हटा। एक कदम।
"तुम... कौन हो?"
मरीज़ ने सिर हिलाया। "अरे, मैं हूँ ना — तेरे चाचा जैसा। तू क्या भूल गया? तेरा नाम तो बचपन में 'छोटू' था। नैना तुझे ऐसे बुलाती थी।"
"छोटू"।
वो नाम। वो आवाज़। वो अंदाज़।
सिर्फ दो लोग उसे ऐसे बुलाते थे — माँ और नैना।
"नैना?" आरव ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी। "तुम नैना को जानते हो?"
मरीज़ ने confused होकर देखा। "जानता हूँ? बेटा, वो तेरी बहन है। तेरी छोटी बहन। वो हमेशा तेरे पीछे लगी रहती थी — 'भैया, मुझे भी ले चलो, भैया, मुझे भी खिलाओ'..."
आरव ने कान बंद किए।
नहीं। ये हो नहीं सकता।
नैना मर चुकी थी। 11 साल पहले। इसी hospital में। Cardiac arrest। 16 साल की उम्र में।
"तुम गलत हो," आरव ने कहा। "नैना... नैना नहीं रही।"
मरीज़ का चेहरा बदला। गम्भीर।
"क्या बोल रहा है? नैना तो अभी हॉस्पिटल में है। ऊपर। Staff quarters में। कल शाम को मैंने उसे देखा था।"
आरव के पैर काँप रहे थे।
"तुम... तुम झूठ बोल रहे हो।"
"झूठ? बेटा, मैं झूठ क्यों बोलूँगा? चल, मैं तुझे दिखाता हूँ। चल नैना के पास।"
मरीज़ ने bed से उतरने की कोशिश की। Monitor की तारें खिंचीं। Machine बीप करने लगी।
"रुको!" आरव ने कहा। "तुम... तुम बीमार हो। Bed पर रहो।"
"मैं बीमार नहीं हूँ, बेटा। तू बीमार है। तू यहाँ क्यों आया है? तुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था।"
मरीज़ ने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।
उसकी उंगलियाँ आरव की कलाई पर आईं।
ठंडी।
बहुत ठंडी। जैसे बर्फ़ ने छू लिया हो।
और तभी — आरव को कुछ याद आया।
छोटी-सी याद। धुँधली। जैसे बहुत पुराना सपना।
वो छोटा था। शायद 8-9 साल का। बारिश हो रही थी। नैना उसके पीछे भाग रही थी। "भैया, रुको! भैया, मुझे भी छाता दो!"
और कोई और भी था। एक आदमी। मुस्कुरा रहा था। नैना को गोद में उठा रहा था।
वो आदमी... वो इसी मरीज़ जैसा दिखता था।
आरव ने हाथ छुड़ाया।
"तुम कौन हो? असल में कौन हो?"
मरीज़ ने देखा। उसकी आँखों में दर्द था।
"बेटा... तू अभी भी नहीं समझा? मैं वो हूँ जो होना चाहिए था। और तू... तू वो है जो नहीं होना चाहिए था।"
"मतलब?"
"मतलब... तेरी जगह कोई और होनी चाहिए थी। मेरी जगह कोई और। हम दोनों... गलत जगह पर हैं।"
आरव ने पीछे हटना शुरू किया।
"तुम पागल हो। तुम बीमार हो। मुझे डॉक्टर बुलाना चाहिए—"
"डॉक्टर? मैं खुद डॉक्टर हूँ, बेटा। और तू भी। लेकिन तू अभी वो नहीं है जो तू होना चाहिए। तू... तू अभी भी पूरा नहीं हुआ।"
"पूरा? क्या पूरा?"
मरीज़ ने bedside table पर इशारा किया।
"Chart देख।"
आरव ने chart उठाया। "Replacement confirmed" अभी भी लिखा था।
लेकिन अब उसके नीचे एक और लाइन थी। हर ink में।
"Death pending."
"Death pending?" आरव ने पढ़ा। "किसकी death?"
मरीज़ ने आरव की आँखों में देखा।
"तेरी।"
आरव ने chart छोड़ दिया।
"मैं... मैं मरने वाला हूँ?"
"नहीं, बेटा। तू मरेगा नहीं। तेरी जगह कोई और आएगा। और तू गायब हो जाएगा। जैसे कभी था ही नहीं।"
आरव ने दरवाज़े की तरफ भागना शुरू किया।
"रुक!" मरीज़ ने पुकारा। "तुझे एक बात बतानी है—"
लेकिन आरव नहीं रुका।
उसने दरवाज़ा खोला। कोरिडोर में भागा। ठंडी दीवारों से टकराता हुआ। अंधेरे में।
और तभी — दरवाज़ा बंद हो गया।
पीछे मुड़ा।
दरवाज़ा नहीं था। दीवार थी।
वो Emergency Wing में खड़ा था। Room 47 के सामने।
अपनी घड़ी देखी — 1:32 AM।
Room 0 की clock — 1:14 AM।
9 मिनट।
वो 9 मिनट... वो उस कमरे में बिताए थे।
लेकिन बाहर... बाहर भी 9 मिनट बीते थे।
आरव ने कोरिडोर देखा। खाली। शांत। फ्लोरोसेंट लाइटें। Buzzing।
जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
लेकिन उसकी कलाई पर — जहाँ मरीज़ ने छुआ था — वहाँ ठंडक अभी भी थी।
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