Chapter 1: First Shift
ऑपरेशन थिएटर की रोशनी में डॉ. आरव मल्होत्रा का चेहरा थका हुआ दिख रहा था। पहली रात थी। जिला अस्पताल का Emergency Wing — उत्तर भारत का वो हिस्सा जहाँ रात दस बजे के बाद सिर्फ दो चीज़ें काम करती हैं — फ्लोरोसेंट लाइटें और मौत।
आरव ने स्टेथोस्कोप गले में डाला और Room 47 की तरफ चला। अंदर एक बुज़ुर्ग मरीज़ थे — दिल की बीमारी, ब्लड प्रेशर अनकंट्रोल्ड, उम्र करीब 72 साल। मॉनिटर पर लाइनें धीमी-धीमी हिल रही थीं।
"सर, ये तीसरी बार आ रहे हैं इस महीने," नर्स प्रिया ने कहा। उसकी आवाज़ में थकान थी। "डॉ. कपूर साहब ने बोला था — अगर फिर से आए तो..."
वो वाक्य अधूरा छोड़ दिया। ज़रूरत नहीं थी। आरव समझ गया। "अगर फिर से आए" का मतलब था — अगर इस बार बच नहीं पाए।
आरव ने मरीज़ की जाँच शुरू की। बीपी गिर रहा था — 80/50। पल्स कमज़ोर, अनियमित। आरव ने ड्रिप एडजस्ट की, इंजेक्शन लगाया, मॉनिटर पर नज़र रखी।
बीस मिनट। तीस मिनट। चालीस मिनट।
मरीज़ की हालत स्थिर होती दिखी। बीपी 90/60 आ गया। पल्स बेहतर। आरव ने राहत की साँस ली। शायद इस बार बच जाएगा।
फिर अचानक — मॉनिटर पर लाइन सीधी हो गई।
बीप ————————
आरव ने देखा। एक सेकंड। दो सेकंड। तीन।
"डॉ. साहब?" प्रिया ने पुकारा।
"Time of death note करो," आरव ने कहा। आवाज़ स्थिर थी। हाथ नहीं काँप रहे थे। AIIMS में ट्रेनिंग के दौरान उसने सीखा था — जब मरीज़ जाए, तो डॉक्टर को रोकना नहीं चाहिए। लेकिन अंदर कुछ टूटा था। पहली बार किसी को अपनी आँखों के सामने जाना पड़ा था।
2:47 AM
आरव ने पेपरवर्क पूरा किया। मृत्यु प्रमाण पत्र भरा। शव को मॉर्चरी भेजा। फिर CCTV फुटेज देखने बैठा — ये हॉस्पिटल का प्रोटोकॉल था। हर मौत के बाद फुटेज रिव्यू करना होता था।
CCTV रूम छोटा था। एक कुर्सी, एक टेबल, चार स्क्रीन। आरव ने कुर्सी खींची और बैठ गया।
स्क्रीन पर Emergency Wing का कैमरा दिख रहा था। कोरिडोर। Room 45, 46, 47, 48... सब नॉर्मल। नर्सें चल रही थीं। एक वार्ड बॉय सामान ले जा रहा था। सब कुछ सामान्य।
आरव ने rewind किया।
2:03 AM — कोरिडोर नॉर्मल।
2:04 AM — कोरिडोर नॉर्मल।
2:05 AM — कोरिडोर बदल गया।
स्क्रीन पर Room 99 के बाद एक और कोरिडोर दिख रहा था। लंबा, अंधेरा, खाली। जैसे hospital का नक्शा अचानक बढ़ गया हो। वो कोरिडोर floor plan में exist नहीं करता था। आरव ने floor plan देखा था — Room 99 के बाद सिर्फ दीवार थी।
लेकिन स्क्रीन पर दीवार नहीं थी। एक और कोरिडोर था।
आरव ने zoom किया।
कोरिडोर के अंत में एक दरवाज़ा था। पुराना, भूरा, थोड़ा झुका हुआ। नंबर प्लेट नहीं। सिर्फ काले रंग से लिखा था:
0
आरव ने फिर rewind किया।
2:04 — नॉर्मल। 2:05 — एक्स्ट्रा कोरिडोर। 2:06 — नॉर्मल।
47 सेकंड।
सिर्फ 47 सेकंड के लिए वो कोरिडोर स्क्रीन पर दिखा था।
आरव ने अपनी घड़ी देखी। 3:15 AM। फिर स्क्रीन पर CCTV का टाइमस्टैम्प देखा — 3:06 AM।
9 मिनट का फर्क।
"शायद सिस्टम ग्लिच है," आरव ने खुद से कहा। CCTV कैमरों में टाइम सिंक की समस्या आम होती है। खासकर पुराने हॉस्पिटल में।
लेकिन वो कोरिडोर... वो दरवाज़ा... वो "0"...
आरव ने footage एक और बार rewind किया।
2:05 AM। कोरिडोर। दरवाज़ा। काले रंग से लिखा "0"।
फिर अचानक — footage नॉर्मल हो गई। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। जैसे वो कोरिडोर कभी था ही नहीं।
आरव ने स्क्रीन बंद की। कुर्सी पर पीछे झुका। सिर टेका।
पहली रात थी। बस इतना ही था। एक मरीज़ मरा। एक ग्लिच दिखा। बस।
लेकिन उसके अंदर कुछ था — वो जानता था कि ये ग्लिच नहीं था। वो कोरिडोर असली था। वो दरवाज़ा असली था।
और वो "0" — वो सिर्फ एक नंबर नहीं था।
आरव ने अपनी घड़ी देखी। चाँदी की पतली घड़ी — नैना ने दी थी। 11 साल पहले। उसकी छोटी बहन। जो इसी हॉस्पिटल में मरी थी।
3:22 AM। शिफ्ट खत्म होने में अभी चार घंटे बाकी थे।
आरव ने स्टेथोस्कोप टाइट किया और कोरिडोर में चला गया।
Room 47 के सामने से गुज़रा। दीवार पर नज़र डाली — वहीं जहाँ स्क्रीन पर वो कोरिडोर दिखा था।
सिर्फ दीवार थी। सफ़ेद, पुरानी, थोड़ी दरार वाली।
आरव ने हाथ रखा।
ठंडी थी।
बाकी दीवारों से ज़्यादा ठंडी। जैसे उसके पीछे कोई खाली जगह हो। कोई जो रोशनी नहीं जानती। कोई जो गर्मी नहीं जानती।
आरव ने हाथ हटाया। पीछे हटा। एक बार और देखा।
सिर्फ दीवार थी।
वो चला गया। लेकिन उसके कदमों की आवाज़ कोरिडोर में गूँजती रही — जैसे कोई और भी चल रहा हो। उसके ठीक पीछे। बिल्कुल करीब।
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