Chapter 11: Old Records
बेसमेंट की सीढ़ियाँ उतरते हुए आरव को लगा जैसे वो समय में पीछे जा रहा है। नीचे का रास्ता तंग था, दीवारों पर नमी के धब्बे, और ऊपर से लटकता एक पुराना ट्यूबलाइट जो बार-बार टिमटिमा रहा था।
रिकॉर्ड रूम एक बड़ा सा कमरा था जिसमें लोहे की अलमारियाँ कतार से लगी थीं। हर अलमारी पर एक तख्ती चिपकी थी — "1990-1995", "1996-2000", "2001-2005" और इसी तरह आगे। धूल की एक मोटी परत हर चीज़ पर जमी हुई थी। कोई भी यहाँ बरसों से नहीं आया था।
आरव ने फोन की टॉर्च जलाई और "2010-2015" वाली अलमारी ढूंढने लगा। उसे नहीं पता था कि वो क्या ढूंढ रहा है — बस मीरा की बात याद थी। नौ मिनट। हर मौत में नौ मिनट का फ़र्क।
अलमारी खोली तो अंदर कागज़ों की गंध उठी — सूखी, खट्टी, जैसे किसी ने बहुत पुरानी किताबें जलाई हों। फाइलें ढेर लगी थीं, कुछ कवर फटे हुए, कुछ पर मकड़ियों के जाले।
आरव ने पहली फाइल खोली। "मृत्यु प्रमाणपत्र — 2011।" नाम था रमेश कुमार, उम्र 54। डायग्नोसिस: कार्डियक अरेस्ट। मृत्यु का समय: रात 2:34 बजे।
लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में एक नोट चिपका था — हाथ से लिखा हुआ। "शरीर का तापमान मृत्यु के समय से मेल नहीं खाता। शरीर अभी भी गर्म था जबकि मृत्यु 9 मिनट पहले हो चुकी थी।"
आरव का दिल ज़ोर से धड़का। उसने फाइल रखी और अगली उठाई।
2012 — सरिता देवी, 67 साल। रात 3:11 बजे मृत्यु। पोस्टमॉर्टम नोट: "शरीर का तापमान 37.2°C। मृत्यु के 9 मिनट बाद भी शरीर गर्म।"
2013 — मोहन सिंह, 48 साल। रात 1:52 बजे। "बॉडी टेम्परेचर डिस्क्रेपेंसी — 9 मिनट।"
2014 — फ़ातिमा बानो, 72 साल। रात 2:08 बजे। "शरीर का तापमान मृत्यु के बाद 9 मिनट तक सामान्य रहा।"
आरव ने और फाइलें खोलीं। सात फाइलें। दस साल में। सात मौतें। हर में वही नोट — नौ मिनट का फ़र्क। और हर मौत रात के बीच में, 1:30 से 3:30 के बीच।
"ये... ये कैसे हो सकता है?" आरव ने खुद से पूछा।
तर्क यही कहता था कि शायद उपकरणों में खराबी होगी। या पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर ने गलती की होगी। लेकिन सात अलग-अलग डॉक्टरों ने वही नोट लिखा हो — ये संभव नहीं था।
फिर उसे एक और फाइल मिली। ये बाकियों से अलग थी। कवर पर नाम लिखा था — "डॉ. आनंद राघव।" और नीचे एक स्टैंप: "आंतरिक जांच — बंद।"
आरव ने फाइल खोली। अंदर डॉ. राघव की फोटो थी — एक बुज़ुर्ग डॉक्टर, चेहरे पर गंभीरता, आँखों में कुछ ऐसा जो डर और जिज्ञासा का मिला-जुला रूप था।
रिपोर्ट में लिखा था: "डॉ. राघव ने दावा किया कि उन्होंने एक ऐसा corridor देखा जो hospital के नक्शे में मौजूद नहीं है। उन्होंने बताया कि उस corridor के अंत में एक दरवाज़ा था — Room 0।"
आरव की साँस रुक गई।
"डॉ. राघव को मानसिक स्वास्थ्य मूल्यांकन के लिए भेजा गया। उन्होंने इनकार किया। उन्होंने कहा — 'मैं पागल नहीं हूँ। मैंने वो देखा है।'"
और फिर एक और लाइन: "डॉ. राघव की मृत्यु — 14 अक्टूबर 2012। कारण: दिल का दौरा। मृत्यु का समय: रात 2:47 बजे।"
रात 2:47। वही समय। वही नौ मिनट।
फाइल के पीछे एक हाथ से लिखा नोट चिपका था। डॉ. राघव की लिखावट — काँपते हुए अक्षर, जैसे लिखने वाला हाथ काँप रहा हो:
"मुझे सब कुछ लिखना होगा। Room 0 सच है। ये दरवाज़ा है — मौत के बाद की दुनिया का। मैंने अंदर देखा है। वहाँ मरे हुए लोग जीवित हैं। लेकिन उनकी जगह दूसरों ने ले ली है। मुझे यह सब लिखना होगा। मुझे सबको बताना होगा।"
अगला पन्ना खाली था।
बिल्कुल खाली।
आरव ने पन्ना पलटा। पीछे भी खाली। अगला भी। और अगला।
फाइल के बाकी सारे पन्ने खाली थे।
जैसे किसी ने सब कुछ मिटा दिया हो।
आरव ने फाइल बंद की और दीवार से टिक गया। बेसमेंट की ठंडी हवा उसकी रीढ़ पर से गुज़र रही थी। ऊपर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी — बस ट्यूबलाइट की भिनभिनाहट और उसकी अपनी तेज़ साँसें।
उसने फोन निकाला और फोटो खींची — डॉ. राघव की फाइल की। हर पन्ने की। खाली पन्नों की भी।
"ज़रूरत पड़ेगी," उसने खुद से कहा।
वो जानता था कि ये सब उसके दिमाग़ की उपज हो सकती है। थकान। नींद की कमी। तनाव। डॉ. कपूर ने भी कहा था — "बेटा, तुम बहुत ज़्यादा काम कर रहे हो।"
लेकिन सात फाइलें। सात नाम। सात रातें। और हर में वही नौ मिनट।
ये संयोग नहीं हो सकता।
आरव ने अलमारी बंद की, सीढ़ियाँ चढ़ीं, और बेसमेंट से बाहर आया। रात की हवा ने उसके चेहरे को छुआ। ऊपर आसमान में तारे थे।
उसका फोन बजा। मीरा का मैसेज:
"कुछ मिला?"
आरव ने टाइप किया: "हाँ। सात केस। सबमें नौ मिनट। और एक और बात — डॉ. राघव। वो भी Room 0 देखा था।"
जवाब आया: "डॉ. राघव? जिनकी 2012 में मृत्यु हो गई?"
"हाँ।"
"मैं जानती हूँ। उनकी मृत्यु भी उसी तरह हुई। नौ मिनट।"
आरव ने फोन को जेब में रखा और चलने लगा। उसका दिमाग़ एक ही बात सोच रहा था —
डॉ. राघव ने लिखा था: "मुझे सबको बताना होगा।"
लेकिन उससे पहले कि वो कुछ बता पाता, वो मर गया।
और उसकी फाइल के बाकी पन्ने... खाली थे।
बीप ————–
आरव ने रात 3 बजे तक फाइलें पढ़ीं। हर केस में वही pattern था — मौत रात के बीच में, शरीर का तापमान ग़लत, और एक छोटा सा नोट जो कोई गंभीरता से नहीं लेता था।
लेकिन आरव ले रहा था।
क्योंकि अब उसके पास सबूत था।
या शायद... सिर्फ डर।
3:47 AM
घर लौटते हुए आरव को रास्ते में एक बात याद आई — डॉ. राघव का आखिरी नोट।
"मुझे सबको बताना होगा।"
अगला पन्ना खाली था।
जैसे किसी ने उसे रोक दिया हो।
जैसे Room 0 ने उसे रोक दिया हो।
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