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कब्रिस्तान का रहस्य
📚 Rudra The Ghost Hunter

कब्रिस्तान का रहस्य

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रुद्र कमरे के बीचों-बीच स्थिर खड़ा था।

बेसमेंट की लड़ाई खत्म हुए कुछ ही घंटे बीते थे, फिर भी ऐसा लग रहा था मानो उस जगह की ठंड अब भी उसका पीछा कर रही हो। यह साधारण ठंड नहीं थी — यह उस तरह की ठंड थी जो त्वचा से नहीं, हड्डियों से चिपक जाती है… और धीरे-धीरे भीतर तक उतर जाती है।

कमरा बंद था, खिड़कियाँ बंद थीं, फिर भी हवा में एक अजीब जड़ता तैर रही थी।

जैसे समय यहाँ थोड़ा धीमा बह रहा हो।

रुद्र ने धीरे से सांस भीतर खींची।

फेफड़ों में हवा गई… पर उसके साथ एक हल्की जलन भी महसूस हुई।

प्राण ऊर्जा का अत्यधिक इस्तेमाल।

शरीर अब उसकी कीमत मांग रहा था।

कंधे भारी थे, मांसपेशियाँ सूक्ष्म कंपन से भरी हुई थीं, और दिल की धड़कन सामान्य होने के बावजूद हर धड़कन उसे याद दिला रही थी — वह आज मौत के बेहद करीब तक गया था।

बहुत करीब।

उसने अपनी हथेलियों की ओर देखा।

हल्की-हल्की लाल रेखाएँ अब भी उभरी हुई थीं — जैसे नसों में ऊर्जा अभी पूरी तरह शांत नहीं हुई हो।

कुछ पल तक वह यूँ ही खड़ा रहा।

फिर उसकी नजर अपनी उंगली पर पड़ी।

अंगूठी।

वही काली, रहस्यमयी अंगूठी।

कल रात तक वह बर्फ जैसी ठंडी थी। उसे पहनते ही ऐसा लगता था जैसे उंगली किसी मृत वस्तु को छू रही हो।

लेकिन अब…

उसमें हल्की गर्माहट थी।

इतनी सूक्ष्म कि कोई और शायद महसूस भी न कर पाए — पर रुद्र ने उसे तुरंत पहचान लिया।

उसने उंगली को थोड़ा हिलाया।

और तभी उसे एहसास हुआ—

गर्माहट स्थिर नहीं थी।

वह धड़क रही थी।

ठीक उसकी नाड़ी की लय पर।

धक…

धक…

धक…

रुद्र की आंखें हल्की सिकुड़ गईं।

“तुम… सुन रही हो?”

उसके होंठों से फुसफुसाहट निकली, जैसे वह खुद भी नहीं जानता था कि यह सवाल किससे पूछा गया है।

कमरे में कोई जवाब नहीं था।

पर सन्नाटा अब खाली नहीं लग रहा था।

जैसे कोई अदृश्य उपस्थिति बस एक परत पीछे खड़ी हो… और उसे देख रही हो।

उसने नजर हटाई और मेज़ पर पड़ी पत्रिका उठा ली।

पन्ने पलटे।

सफेद।

पूरी तरह खाली।

न कोई लाल अक्षर।

न कोई चेतावनी।

न कोई आदेश।

लेकिन रुद्र के भीतर एक अजीब विश्वास था — यह मौन निष्क्रिय नहीं है।

यह प्रतीक्षा है।

गहरी… धैर्यवान… लगभग जीवित।

वह कुछ क्षण तक पन्नों को देखता रहा, फिर पत्रिका बंद कर दी।

उसके कदम धीरे-धीरे कमरे में गूंजने लगे।

टिक…

टिक…

पत्थर की ठंडी सतह से टकराकर लौटती आवाज़ उसे बार-बार याद दिला रही थी — इस समय वह यहाँ अकेला है।

कम से कम… दिखने में।

अचानक उसकी स्मृति में वह धुंधली छवि फिर उभरी।

लाल आभा।

घूंघट।

और वे आँखें…

आंखें जिन्हें उसने साफ नहीं देखा था, फिर भी भूल नहीं पा रहा था।

वह अंतिम क्षण।

जब सब खत्म होने वाला था।

जब हवा भारी हो चुकी थी।

जब प्राण ऊर्जा टूटने के कगार पर थी।

और तभी—

बिना सामने आए… किसी ने उसकी मदद की थी।

रुद्र के होंठ हल्के से हिले।

“तुमने मेरे लिए इतना किया… फिर भी सामने नहीं आई।”

उसके स्वर में कृतज्ञता कम थी…

जिज्ञासा ज्यादा।

वह डर नहीं रहा था।

और यही सबसे अजीब बात थी।

एक सामान्य इंसान उस रात के बाद शायद सो भी न पाता।

लेकिन रुद्र के भीतर…

डर की जगह कुछ और जन्म ले चुका था।

एक शांत उत्सुकता।

जैसे किसी ने उसके सामने एक विशाल, अदृश्य दरवाज़ा खोल दिया हो… और अब वह उसके पार झांकना चाहता हो।

उसी क्षण बाहर कहीं एक चिड़िया चहकी।

ध्वनि बहुत साधारण थी।

पर उसने कमरे की जड़ता को तोड़ दिया।

रुद्र खिड़की की ओर बढ़ा और परदा थोड़ा सा हटाया।

पूर्व दिशा हल्की सुनहरी होने लगी थी।

रात पीछे हट रही थी।

और फिर—

सूरज की पहली किरण क्षितिज से निकली।

सुनहरी रोशनी धीरे-धीरे “काली पहाड़ी” सोसाइटी की इमारतों पर फैलने लगी।

अजीब बात थी।

जैसे ही रोशनी फैली… पूरी जगह बदल गई।

रात की सड़ांध — गायब।

गलियारों की फुसफुसाहट — बंद।

दीवारों पर रेंगती परछाइयाँ — लुप्त।

मानो कुछ हुआ ही न हो।

जैसे यह वही साधारण रिहायशी सोसाइटी हो जहाँ लोग सुबह उठकर चाय बनाते हैं, अखबार पढ़ते हैं और ऑफिस की तैयारी करते हैं।

लेकिन रुद्र जानता था।

यह सामान्यता एक परत है।

सिर्फ एक परत।

उसने नज़र झुकाकर नीचे सड़क की तरफ देखा—सोसाइटी के बाहर की हलचल दूर से भी साफ महसूस हो रही थी।

एक दूधवाला साइकिल पर जा रहा था।

एक बुजुर्ग धीमे कदमों से टहल रहे थे।

जीवन अपनी लय में लौट आया था।

और ठीक इसी बात ने रुद्र को हल्का सा मुस्कुरा दिया।

“इंसान कितनी जल्दी भूल जाता है…”

उसने सोचा।

“या शायद… उन्हें कभी पता ही नहीं चलता।”

उसने खिड़की खोली।

ठंडी सुबह की हवा उसके चेहरे से टकराई।

इस बार ठंड अलग थी।

जीवित।

स्वच्छ।

उसने सिर थोड़ा ऊपर उठाया और कुछ सेकंड तक सूरज को देखता रहा।

आंखें हल्की सिकुड़ीं… फिर भी उसने नजर नहीं हटाई।

फिर उसने एक लंबी सांस ली।

इतनी लंबी — जैसे वह फेफड़ों में सिर्फ हवा नहीं, बल्कि जिंदा होने का एहसास भर लेना चाहता हो।

“मैं अभी भी जिंदा हूँ…”

विचार उसके भीतर बहुत धीमे उभरा।

और उसी के साथ एक दूसरा विचार आया—

“कितने समय तक?”

उसके होंठों पर हल्की मुस्कान उभरी।

डर नहीं था।

बस एक अजीब बेचैनी…

और उससे भी ज्यादा—

उत्साह।

शिकारी पहली रात बच चुका था।

अब खेल सच में शुरू होगा।

कुछ देर बाद वह बिल्डिंग के मुख्य गेट से बाहर खड़ा था।

सुबह पूरी तरह जाग चुकी थी।

लेकिन जैसे ही उसने पीछे मुड़कर उस इमारत को देखा…

उसकी मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई।

ऊपर की मंजिलों की खिड़कियाँ शांत थीं।

बहुत शांत।

एक पल के लिए उसे भ्रम हुआ—

मानो किसी खिड़की के पर्दे के पीछे से कोई हट गया हो।

रुद्र की नजर वहीं टिक गई।

तीन सेकंड।

चार।

पाँच।

कुछ नहीं।

वह हल्का सा हंसा।

“अब दिमाग खेल खेलने लगा है…”

लेकिन भीतर कहीं एक आवाज आई—

नहीं।

तुम बदल चुके हो।

अब तुम्हारी इंद्रियां वह भी महसूस करेंगी… जो पहले कभी नहीं कर पाती थीं।

अचानक उसके कंधों में भारीपन का एहसास फिर लौट आया।

पूरी रात की लड़ाई।

प्राण ऊर्जा।

उम्र का सौदा।

यह जीत मुफ्त नहीं थी।

थकान अब शरीर से आगे बढ़कर चेतना तक पहुंच चुकी थी।

उसे एहसास हुआ—

अगर वह अभी लेट जाए… तो शायद घंटों सोता रहे।

पर अजीब बात यह थी—

नींद नहीं आ रही थी।

ऊर्जा खत्म थी।

पर भीतर कुछ जाग चुका था।

एक लक्ष्य।

एक दिशा।

और शायद…

एक लत।

खतरे की लत।

करीब दस मिनट बाद वह अपने फ्लैट के अंदर था।

दरवाज़ा बंद करते ही उसने आदतन कमरे का निरीक्षण किया।

सोफा।

टेबल।

दीवार।

कोना।

छत।

सब सामान्य दिख रहा था।

लेकिन अब वह “सामान्य” शब्द पर भरोसा नहीं करता था।

उसने गंडासा दीवार के सहारे टिकाया।

धातु की हल्की टंकार कमरे में गूंजी।

वह कुर्सी पर बैठ गया और सिर पीछे टिका दिया।

कुछ सेकंड तक आंखें बंद रहीं।

अंधेरा।

और उस अंधेरे में—

उसे लगा जैसे कहीं बहुत दूर…

पायल की एक बेहद धीमी आवाज आई।

छन…

रुद्र की आंखें तुरंत खुल गईं।

कमरा खाली था।

सन्नाटा स्थिर।

कुछ नहीं।

कुछ भी नहीं।

उसने गहरी सांस छोड़ी।

“कल्पना…”

पर उसकी उंगली की अंगूठी…

अब पहले से थोड़ी ज्यादा गर्म थी।

रुद्र कुछ क्षण तक स्थिर बैठा रहा।

उसकी नजर अब भी अंगूठी पर टिकी थी।

गर्माहट बढ़ी नहीं थी… लेकिन अब वह पहले से अधिक स्पष्ट महसूस हो रही थी। जैसे कोई अदृश्य धड़कन धीरे-धीरे उसके शरीर की लय से खुद को मिला रही हो।

उसने उंगली से अंगूठी को घुमाने की कोशिश की।

अंगूठी हिली नहीं।

बल्कि एक पल के लिए ऐसा लगा मानो वह त्वचा में और गहराई तक बैठ गई हो।

रुद्र की भौंह हल्की सिकुड़ी।

“अब तुम उतरोगी भी… या नहीं?”

स्वर शांत था, लेकिन उसमें एक अनजानी स्वीकृति छिपी थी — जैसे वह भीतर ही भीतर समझ चुका हो कि यह कोई साधारण वस्तु नहीं।

उसने नजर हटाई।

थकान अब धीरे-धीरे भारी चादर की तरह उस पर गिर रही थी, फिर भी उसका मन अजीब तरह से जाग्रत था।

अचानक उसने सीधा होकर बैठते हुए धीमे स्वर में कहा—

“सिस्टम… स्टेटस।”

हवा में एक बेहद हल्का कंपन उठा।

जैसे कमरे की अदृश्य परतों में किसी ने उंगली फेर दी हो।

और फिर—

उसके सामने नीली रोशनी का एक पारदर्शी पैनल उभरा।

रोशनी तेज नहीं थी, फिर भी उसमें एक ऐसी स्पष्टता थी जो नजर हटाने नहीं देती।

पैनल के किनारे धीमे-धीमे धड़क रहे थे… बिल्कुल उसकी नाड़ी की तरह।

रुद्र की आंखें स्थिर हो गईं।

---

HOST: Rudra Pratap Age: 20

Remaining Lifespan: 412 Days

Ability: Prana Absorption — Level 1 Combat Art: Kaal Bhairav Blade — 6.4/10

Spirit Kills: 3 Elite Spirits Defeated: 1

Hidden Quest Active: Seal the Black Hill Gate Time Limit: Unknown

Warning: Higher Order Entities roaming nearby.

---

कमरे का सन्नाटा और गहरा हो गया।

रुद्र की नजर एक ही पंक्ति पर अटक गई—

Remaining Lifespan: 412 Days

चार सौ… बारह।

उसने अनजाने में उस संख्या को मन ही मन दोहराया।

फिर धीरे से सिर कुर्सी पर टिकाया और छत की ओर देखने लगा।

“कल तक… सिर्फ 365 दिन थे।”

उसके होंठों पर एक बहुत हल्की मुस्कान उभरी।

थकी हुई… पर सच्ची।

“मतलब रास्ता सही है।”

यह कोई सामान्य इंसान की प्रतिक्रिया नहीं थी।

ज्यादातर लोग अपनी मौत की उलटी गिनती देखकर टूट जाते।

घबरा जाते।

भागना चाहते।

लेकिन रुद्र के भीतर डर की जगह गणना शुरू हो चुकी थी।

उसकी आंखें धीरे-धीरे बंद हुईं… और मन संख्याओं में सोचने लगा।

सैंतालीस दिन।

एक रात की कीमत।

उसने सोचा—

“अगर तीन आत्माएँ… सैंतालीस दिन दे सकती हैं…”

“तो दस?”

“बीस?”

उसकी उंगलियां कुर्सी के हत्थे पर धीमी लय में थाप देने लगीं।

टक…

टक…

टक…

यह उसकी पुरानी आदत थी।

जब भी उसका दिमाग किसी समस्या को खोलने लगता — शरीर अपने आप स्थिर हो जाता, और उंगलियां सोचने लगतीं।

“सीधी बात है,” उसने मन ही मन विश्लेषण किया, “छोटी आत्माएँ — जिंदगी देती हैं।”

“बड़ी आत्माएँ — जिंदगी और ताकत दोनों।”

उसकी सांस एक पल को गहरी हुई।

“लेकिन…”

उसकी नजर नीचे खिसकी।

स्क्रीन की अंतिम पंक्ति पर।

Higher Order Entities roaming nearby.

कमरे का तापमान जैसे एक डिग्री गिर गया।

उसे तुरंत वह दरवाज़ा याद आया।

काला।

विशाल।

और उसके पीछे…

कुछ।

कुछ ऐसा जिसने सिर्फ हिलकर ही हवा को भारी कर दिया था।

उसके गले में सूखापन उतर आया, पर चेहरे पर कोई भय नहीं उभरा।

सिर्फ सावधानी।

“वह चीज…” उसने सोचा, “जिंदगी दे भी सकती है… और एक पल में खत्म भी।”

कुछ सेकंड तक वह चुप बैठा रहा।

फिर अचानक सीधा हो गया।

उसकी आंखों में वही ठंडापन लौट आया।

शिकारी वाला।

वह ठंडापन जो भावनाओं को नहीं, फैसलों को जगह देता है।

“प्लान बनाते हैं।”

उसने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया — जैसे खुद को आदेश दे रहा हो।

“पहला — बिना तैयारी के उस गेट के पास नहीं जाना।”

बेसमेंट की हवा याद आते ही उसकी त्वचा पर हल्की सिहरन दौड़ गई।

“दूसरा — हथियार बदलना होगा।”

उसकी नजर दीवार से टिके गंडासे पर गई।

उस हथियार ने कल उसकी जान बचाई थी।

लेकिन अब…

उसे देखकर पहली बार लगा — यह पर्याप्त नहीं।

“यह सिर्फ शुरुआत के लिए ठीक है,” उसने सोचा, “मुझे कुछ ऐसा चाहिए… जो आत्माओं को सिर्फ छुए नहीं — काट दे।”

उसके मन में धुंधले विचार उभरे—

धातु।

मंत्र।

ऊर्जा-संवाहक हथियार।

शायद… कोई ऐसा अस्त्र जो प्राण को सह सके।

“तीसरा — प्राण ऊर्जा पर नियंत्रण।”

इस बार उसके जबड़े हल्के भींच गए।

कल रात का वह क्षण याद आया—

जब उसने ओवरड्राइव इस्तेमाल किया था।

उस पल ताकत असीम लगी थी।

और अगले ही पल…

ऐसा लगा था जैसे जीवन उसकी नसों से बाहर खींचा जा रहा हो।

“हर लड़ाई जीतकर भी… जिंदगी हारना बेवकूफी होगी।”

उसने धीरे से मुट्ठी भींची।

नसें उभर आईं।

“मुझे मजबूत नहीं… कुशल बनना होगा।”

कुछ सेकंड तक वह स्क्रीन को देखता रहा।

फिर एक और विचार उभरा।

धीमा… लेकिन भारी।

“और चौथा…”

उसकी नजर खिड़की की ओर उठी।

सूरज अब पूरी तरह ऊपर आ चुका था।

सड़कें भरने लगी थीं।

जीवन सामान्य था।

और ठीक इसी कारण — असामान्यता और डरावनी लग रही थी।

रुद्र हल्का सा मुस्कुराया।

“मुझे इस सोसाइटी का इतिहास जानना होगा।”

उसके मन में छवियाँ एक-एक कर उभरीं—

श्मशान की जमीन।

दीवारों पर लाल हाथों के निशान।

घूंघट वाली दुल्हन।

वह दरवाज़ा।

“यह सब अलग घटनाएँ नहीं हैं…”

“यह एक कहानी है।”

“और मैं… अब उसके बीच में खड़ा हूँ।”

उसी क्षण सिस्टम फिर चमका।

नीली रोशनी हल्की तरंगों की तरह कांपी।

New Notification

रुद्र की नजर तुरंत उधर गई।

Passive Skill Unlocked: Fear Resistance — Minor Effect: Supernatural pressure has reduced impact on host.

उसकी भौंह हल्की उठी।

फिर एक छोटी, लगभग अदृश्य हंसी उसके गले में अटककर रह गई।

“अच्छा…”

“तो डर भी ट्रेन किया जा सकता है।”

उसने इस विचार को महसूस किया।

डर खत्म नहीं हुआ था।

बल्कि…

वह आकार बदल चुका था।

अब वह उसे रोक नहीं रहा था।

धक्का दे रहा था।

रुद्र धीरे-धीरे खड़ा हुआ।

शरीर अब भी थका था।

मांसपेशियां भारी थीं।

लेकिन उसके भीतर कुछ और जाग चुका था—

लक्ष्य।

वह खिड़की तक गया।

सूरज की रोशनी सीधे उसके चेहरे पर पड़ी।

गरम।

स्थिर।

जीवित।

उसने आंखें बंद कर लीं।

कुछ सेकंड तक बस खड़ा रहा।

और बहुत धीमी आवाज में कहा—

“एक साल… काफी है।”

कुछ पल बीते।

हवा स्थिर रही।

फिर उसने आंखें खोलीं।

अब उनमें कोई हिचक नहीं थी।

सिर्फ निर्णय।

“या तो मैं उस दरवाज़े को बंद करूँगा…”

उसके होंठों पर वही शिकारी वाली मुस्कान लौटी।

धीमी।

खतरनाक।

“…या फिर जो भी उसके पीछे है — उसे खोलकर खत्म कर दूँगा।”

कुछ क्षण तक वह खिड़की के पास खड़ा रहा।

सूरज की रोशनी अब कमरे में पूरी तरह फैल चुकी थी, फिर भी उसे अजीब लग रहा था — जैसे यह उजाला सिर्फ बाहर तक सीमित हो… और कमरे के किसी कोने में अब भी रात का एक छोटा टुकड़ा छिपा बैठा हो।

रुद्र ने धीरे से परदा वापस गिरा दिया।

रोशनी थोड़ी कम हुई।

और उसी के साथ उसका मन फिर से भीतर की ओर मुड़ गया।

“इतिहास…” उसने बुदबुदाया।

किसी भी शिकार को समझने से पहले उसके क्षेत्र को समझना जरूरी होता है।

यह बात उसने जिंदगी से सीखी थी।

और अब — यह सोसाइटी उसका शिकार-क्षेत्र बन चुकी थी।

वह टेबल की ओर बढ़ा और फोन उठा लिया।

कुछ सेकंड तक स्क्रीन को देखता रहा… फिर सर्च खोल दी।

“काली पहाड़ी सोसाइटी रामगढ़ हिस्ट्री”

एंटर।

नेट धीमा था, जैसे जानकारी भी सामने आने से हिचक रही हो।

कुछ सामान्य रियल एस्टेट साइट्स खुलीं — “प्राइम लोकेशन”, “ग्रीन व्यू अपार्टमेंट”, “शांत वातावरण”।

रुद्र के होंठों पर हल्की व्यंग्यात्मक मुस्कान आई।

“शांत…”

उसने स्क्रॉल किया।

फिर एक पुराना ब्लॉग लिंक दिखा।

लोड होने में समय लगा।

पेज खुलते ही धुंधली सी तस्वीर सामने आई — निर्माणाधीन इमारत… और पीछे एक काली, पत्थरीली पहाड़ी।

नीचे एक लाइन लिखी थी:

“इस जमीन को खरीदने में पांच साल लगे — स्थानीय विरोध के कारण।”

रुद्र की आंखें थोड़ी सिकुड़ीं।

उसने पढ़ना शुरू किया।

> “स्थानीय लोगों का मानना था कि यह पहाड़ी क्षेत्र पुराने श्मशान का हिस्सा रहा है। हालांकि आधिकारिक रिकॉर्ड में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता…”

उसके अंगूठे की गति रुक गई।

श्मशान।

तो यह सिर्फ अफवाह नहीं थी।

आगे लिखा था—

> “निर्माण के शुरुआती महीनों में कई मजदूरों ने रात में ‘लाल कपड़ों वाली महिला’ देखने का दावा किया। कंपनी ने इसे अंधविश्वास बताकर खारिज कर दिया…”

रुद्र के मन में तुरंत वह छवि उभरी।

लाल आभा।

घूंघट।

सहायता करता हुआ अदृश्य हाथ।

उसकी पकड़ फोन पर थोड़ी मजबूत हो गई।

उसने आगे पढ़ा।

> “तीसरी बिल्डिंग की नींव खोदते समय कई पुराने अस्थि-अवशेष मिलने की अनौपचारिक चर्चा भी हुई थी, लेकिन बाद में परियोजना बिना किसी रुकावट के पूरी कर ली गई।”

“अनौपचारिक चर्चा…” रुद्र धीमे से हंसा।

“मतलब… दबा दिया गया।”

उसने फोन लॉक किया।

कमरे में फिर सन्नाटा फैल गया।

अब यह सन्नाटा खाली नहीं था।

यह जानकारी से भरा हुआ था।

और जानकारी… हमेशा खतरे को आकार देती है।

रुद्र ने सिर थोड़ा झुकाया।

सोचने लगा।

“अगर यह सच में श्मशान था…”

“तो दरवाज़ा कोई संयोग नहीं।”

उसकी सांस धीमी हो गई।

“यह जगह… शायद पहले से एक सीमा थी।”

जीवित और मृत के बीच।

उसी क्षण —

उसे एक और बात याद आई।

वह बच्चा।

ग्रेवकीपर।

उसकी आंखों में उम्र नहीं थी… पर प्राचीन ठंडक थी।

“वे यहाँ घूम क्यों रहे थे?”

“क्या वे पहरेदार हैं… या कैदी?”

उसकी उंगलियां फिर टेबल पर थाप देने लगीं।

टक…

टक…

टक…

जैसे हर आवाज़ सोच को और गहरा कर रही हो।

अचानक उसके मन में एक विचार आया।

जानकारी सिर्फ इंटरनेट पर नहीं मिलती।

पुरानी जगहों के सबसे बड़े अभिलेख होते हैं — लोग।

वह तुरंत उठ खड़ा हुआ।

दरवाज़ा खोला।

गलियारा पूरी तरह सुनसान था

पर बाहर सडक पर के लोगो को सब कुछ इतना सामान्य दिखाई दे रहा था कि अगर किसी को पिछली रात की सच्चाई बता दी जाती… तो शायद वह उसे सुनकर हँस पड़ता।

रुद्र लिफ्ट की ओर बढ़ा।

कुछ सेकंड बाद नीचे था।

रुद्र पास की सोसाइटी के पास पंहुचा

गार्ड रूम के बाहर एक दुबला-पतला बुजुर्ग चौकीदार कुर्सी पर बैठा चाय पी रहा था।

चेहरा झुर्रियों से भरा… आंखें धंसी हुई… लेकिन चौकन्नी।

रुद्र उसके पास जाकर रुक गया।

“काका,” उसने सहज स्वर में कहा, “एक बात पूछनी थी।”

बुजुर्ग ने नजर उठाई।

कुछ पल तक उसे देखता रहा।

फिर बोला, “नए हो?”

“हां।”

“पूछो।”

रुद्र कुछ सेकंड चुप रहा।

फिर सीधे कहा—

“क्या बगल वाली society की जमीन… पहले श्मशान थी क्या?”

चाय का कप हवा में ही रुक गया।

बुजुर्ग की आंखों में एक बेहद सूक्ष्म बदलाव आया।

इतना हल्का… कि सामान्य नजर शायद पकड़ ही न पाए।

लेकिन रुद्र ने देख लिया।

कुछ सेकंड बाद उसने कप नीचे रखा।

“लोग बहुत बातें करते हैं,” वह धीमे बोला, “सब सच नहीं होता।”

रुद्र ने नजरें हटाईं नहीं।

“मतलब कुछ… होता है?”

बुजुर्ग ने गहरी सांस ली।

फिर थोड़ा झुककर बोला—

“रात में बाहर मत निकला करो।”

सीधा जवाब नहीं।

पर सबसे सच्चा।

रुद्र की दिलचस्पी और बढ़ गई।

“आपने कुछ देखा है?”

बुजुर्ग चुप।

हवा कुछ पल स्थिर रही।

फिर उसने बहुत धीमे स्वर में कहा—

“मैंने नहीं… पर मेरे पहले जो गार्ड था… उसने नौकरी छोड़ दी थी।”

“क्यों?”

इस बार बुजुर्ग की नजरें सीधे रुद्र की आंखों में उतरीं।

और उसने फुसफुसाकर कहा—

“उसने कहा था… तीसरी बिल्डिंग की छत पर हर अमावस को कोई चुड़ैल खड़ी रहती है।”

रुद्र के भीतर कुछ ठिठका।

धड़कन एक पल को भारी हुई।

“और?”

“और क्या… अगले ही हफ्ते चला गया।”

“कोई हादसा?”

बुजुर्ग ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

फिर धीमे जोड़ा—

“पर जाते समय बोला था… यहाँ कुछ इंतजार कर रहा है।”

हवा अचानक थोड़ी ठंडी लगी।

रुद्र कुछ पल चुप खड़ा रहा।

फिर हल्का सा मुस्कुराया।

डर से नहीं।

पहचान से।

टुकड़े जुड़ने लगे थे।

वह मुड़ा और वापस चल पड़ा।

पीछे से बुजुर्ग की आवाज आई—

“बेटा।”

रुद्र रुका।

“अगर रात में… पायल सुनाई दे ना…”

कुछ सेकंड की खामोशी।

“…तो पीछे मत देखना।”

अगर तुम कही और जा सकते हो तो चले जाओ

रुद्र की मुस्कान इस बार थोड़ी गहरी हुई।

“देखूंगा,” उसने मन ही मन कहा।

“जरूर देखूंगा।”

लिफ्ट में खड़ा वह अपनी परछाईं को देख रहा था।

और पहली बार उसे साफ महसूस हुआ—

वह इस जगह पर रहने नहीं आया।

उसे अपनी जिंदगी को बढ़ाने के लिए ऐसी ही जगह की जरूरत थी

फ्लैट का दरवाज़ा खोलते ही उसकी नजर सीधे टेबल पर गई।

लाल शादी का निमंत्रण वहीं पड़ा था।

लेकिन…

अब वह पूरी तरह स्थिर नहीं था।

कागज का एक कोना हल्का-हल्का हिल रहा था।

जबकि खिड़की बंद थी।

पंखा बंद था।

हवा… नहीं थी।

रुद्र धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

कमरे का तापमान जैसे एक डिग्री गिर गया।

उसने निमंत्रण उठाया।

कागज बर्फ जैसा ठंडा था।

और तभी—

उसने देखा।

शब्द बदल चुके थे।

स्याही ताजा लग रही थी।

मानो अभी लिखी गई हो।

अब वहाँ लिखा था—

“सगाई पूरी हुई। शादी अभी बाकी है…”

उसी क्षण…

उसकी उंगली की अंगूठी धड़क उठी।

धक।

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